प्रदूषण – Pollution in Hindi | Paryavaran Pradushan | Pollution Essay in Hindi

पर्यावरण प्रदूषण

हैल्लो दोस्तो ! आज हम प्रदूषण (Pollution) को लेकर चर्चा करने वाले है। जिसमें हम प्रदूषण क्या है (Pradushan Kya Hai) और विभिन्न प्रकार के प्रदूषण के प्रकार, कारण और उपाय के बारे में जानेगें। साथ ही पर्यावरण प्रदूषण पर निबंध भी पढेंगें l तो चलिए बढ़ते है। आज के आर्टिकल की ओर…Pollution in Hindi

Table of Content

प्रदूषण – Pollution in Hindi

Pollution in Hindi

दोस्तों जैसे-जैसे जनसंख्या में वृद्धि होती जा रही है। उसी तेजी के साथ प्रदूषण और प्रदूषण फैलाने वाले कारक बढ़ते ही जा रहें है। आज हम अपने स्वास्थ्य के साथ ऐसा सौदा कर रहे है। जो हमें भविष्य में काफी कष्ट देने वाला होगा। हम अपने बारे में सोचते है और प्रकृति को नीरस मान कर इसे अपने से अलग कर चुके है। तो दोस्तो प्रदूषण फैलाने की बात करें तो प्रदूषण फैलाने वाले सबसे बड़े कारक हम खुद ही है। तो चलिए अब जाने कि प्रदूषण क्या है – Pradushan Kya Hai


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पर्यावरण प्रदूषण (Paryavaran Pradushan)

पर्यावरणीय प्रदूषण औद्योगिक नगर तकनीकी क्रांति एवं प्राकृतिक संसाधनों का हर क्षण तीव्र दोहन का परिणाम है। विकास के लिए सम्पूर्ण विश्व के राष्ट्रों के बीच धूम मची हुई है। कृषि, उद्योग, यातायात एवं तकनीक में प्रगति की सनक किसी देश के विकास के सामान्य प्रमाण माने जाते हैं। इस प्रकार की क्रियाएं जीवमण्डल में सभी सजीव जन्तुओं पर विपरीति प्रभाव डालते हैं। तीव्र गति से औद्योगिकरण ने प्रदूषित नदियों मलिन मिट्टी, रिक्त जंगली जीव एवं रिक्त प्राकृतिक संसाधनों के साथ हमें छोङ दिया है। आज वातावरण दूषित, गन्दा, अनिच्छित तथा सजीव जन्तुओं के स्वास्थ्य के लिए हानिकार, हो गया है।

पर्यावरण प्रदूषण का मुख्य कारण प्रकृति के साथ मानव का बुरा व्यवहार है, वह प्रकृति का स्वामी है। यह अनिच्छित स्थिति मानव द्वारा निर्मित है। जिससे स्वयं मानव एवं अन्य पृथ्वी के सजीव प्राणी भयभीत हैं। वातावरण में जहां तक प्रदूषण से सम्बद्ध है उनमें वायु, जल, मिट्टी, ध्वनि, भवन, दृष्टिगोचर प्रदेश, समुद्र, झीलें, नदियां, उद्यान, मोटर-गाडियां एवं अनेक दूसरी चीजें आती हैं। सामान्य प्रदूषण परिभाषित किया जाता है – ’’पानी, हवा या भूमि का उन मौलिक अंशों का योग है जिसे पर्यावरण के प्राकृतिक गुण को विपरीतता से बदला जाता है।’’ कुछ मामलों में प्रदूषण पर्यावरण के मौलिक अंशों को जोङने की अपेक्षा हटाना शामिल हो सकता है।

प्रदूषण क्या है – Pradushan Kya Hai

Pollution शब्द लैटिन भाषा के Pollutionen शब्द से बना है। जिसका मतलब होता है ’दूषित करना या गन्दा बनाना’। अतः प्रदूषण का अर्थ है वातावरण को दूषित करने का कार्य

आधुनिक भू-वैज्ञानिक प्रदूषण के अनेक कारक बतलाते हैं – जैसे मानव जनसंख्या विस्फोट, तीव्र गति से औद्योगिकरण, जंगल का विनाश, अनियोजित शहरीकरण, वैज्ञानिक एवं तकनीकी अनुसंधान इत्यादि, जो मुख्यतः धरती पर प्रदूषण संकट के लिए उत्तरदायी हैं। यह एक अच्छा साक्ष्य है कि यूनाइटेड स्टेट्स अपने विशाल औद्योगिक संरचना के कारण विश्व का एक प्रमुख प्रदूषण उत्पन्न करने वाला राष्ट्र है। सबसे ज्यादा प्रदूषण उन राष्ट्रों में उत्पन्न होता है जहां सबसे अधिक वैज्ञानिक एवं तकनीकी अनुसंधान हुए हैं।

आधुनिक तकनीक के साथ तीव्र जनसंख्या वृद्धि गम्भीर वातावरणीय संकट के कारण बने। इसका कारण है कि विकसित देशों में वहां के नागरिक अधिक खाद्य-पदार्थ उपयोग करते हैं, उर्वरक, कृषि औषधियों, ईंधन, खनिज, मोटर-गाडियों तथा अन्य सभी प्रकार के आधुनिक उत्पादन प्रयोग करते हैं। प्रायः ये सभी उत्पाद एक या दूसरे प्रकार की कम्पनियों में उत्पादित किये जाते हैं। ये उद्योग हमारे वातावरण में प्रदूषण के कणों की वृद्धि के लिए जिम्मेवार हैं तथा प्रदूषण के कारण हैं।

आज हर चीज प्रदूषित है। नदियां, समुद्र, झीलें, अनेक प्रकार के उद्योगों से आये कचरों से प्रदूषित हैं – हवा थर्मल पावर प्लांट से विषैली गैसों एवं मोटर-गाङियों से निकले मलबा से तथा भूमि या मिट्टी रसायनों, उर्वरकों, एसिड की बारीस एवं कृमि हत्या की औषिधियों द्वारा।

प्रदूषण किसे कहते है – Pradushan Kise Kahate Hain

Definition of Pollution in Hindi : प्रदूषण सामान्यतः मानव क्रिया के व्यर्थ उत्पादों के वातावरण में मिलने से उत्पन्न होता है। जब व्यर्थ उत्पाद वायुमण्डल के प्राकृतिक, जैविक एवं भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा सम्मिलित, विनष्ट अथवा हटाया नहीं जाता है तब विपरीत प्रभाव का परिणाम प्रदूषण के कणों के रूप में ही हो सकता है या अत्यधिक विषैले कणों में परिवर्तित हो सकता है इस प्रकार जो सामग्री या चीजें वातावरण के प्रदूषण का कारण होती है उन्हें प्रदूषण(Pollution) कहते हैं।

प्रदूषण की कुछ अन्य परिभाषाएं

  1. ⇒प्रदूषण वे भौतिक अथवा जैविक तत्त्व हैं जो जातियों के वृद्धि दर में परिवर्तन द्वारा वातावरण में विपरीत परिवर्तन करता है तथा खाद्य क्रम, स्वास्थ्य सुविधा, चीजों या मानव के सम्पत्ति मूल्य में हस्तक्षेप करता है।
  2. प्रदूषण वातावरण में उपस्थित ऐसी हानिकारक ठोस, द्रव या गैसीय कण हैं जो सम्पूर्ण सजीव प्राणियों के लिए हानिकारक है।

प्रदूषण का वर्गीकरण

  • उनके रूपों, वातावरण में उनके अस्तित्व के आधार पर प्रदूषण के कणों को दो भागों में बांटा जा सकता है – प्राथमिक एवं द्वितीयक।

(क) प्राथमिक प्रदूषण (Primary Pollution in Hindi)

वे कण जो परिचित स्रोतों से सीधे उत्पादित है। ये प्रदूषण के कण वातावरण में उन्मुक्त अथवा मिलने के उपरान्त अस्तित्व में आते हैं। उदाहरणार्थ – सल्फर डाईऑक्साइड, नाइट्रोजन अक्साइड आदि।

(ख) द्वितीयक प्रदूषण (Secondary Pollution in Hindi)

ये वे कण होते हैं जो रासायनिक अन्तक्रियाओं द्वारा प्राथमिक प्रदूषणों से उत्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए, प्राथमिक प्रदूषण जैसे – हाइड्रोकार्बन एवं नाइट्रोजन ऑक्साइड, विशेष रूप से वातावरण में, सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति से अन्तःक्रिया कर मिश्रण वे एक समूह का रूप धारण करते हैं। जैसे – परआक्सीटिल नाइट्रेट द्वितीयक प्रदूषण की भांति कार्य कर्ता है।

  • इकोसिस्टम की दृष्टि से प्रदूषणों को दो भागों में बांटा जा सकता है –

(क) जैविक प्रदूषण (Organic Pollution in Hindi)

इसके अन्तर्गत घरेलू सीवेज एवं गर्मी आदि आते हैं। यदि जैविक कूङे नाली के माध्यम से निवासी भवनों से निकलते हैं तो आसानी माइक्रो आर्गेनिज्म द्वारा वे कम किये जाते हैं जो इकोसिस्टम के लिए लाभप्रद होते हैं। घरेलू सीवेज प्राकृतिक प्रक्रियाओं अथवा इंजीनियरिंग तरीकों से शीघ्रता से विनष्ट किये जा सकते हैं। जो विनिष्ट करने के लिए प्रकृति की शक्ति को बढ़ाती है। जबकि, यदि ये प्रदूषण के कण इतनी विशाल मात्रा में वातावरण में प्रवेश करते हैं तो सभी का पूर्ण क्षय नहीं हो सकता, तब ये जैव क्षयित प्रदूषण के कण की श्रेणी में आ जाते हैं तथा वातावरण को प्रदूषित करते हैं।

(ख) अजैविक प्रदूषण (Abiotic Pollution)

अनेक प्रकार के प्रदूषण कण होते हैं जैसे एल्यूमिनियम, लोहा, पारा, नमक, फेनालिक मिश्रण एवं डी.डी. टी. जो सामान्यतः वातावरण में उपस्थित नहीं होते हैं। ये या तो विनष्ट नहीं होते या बहुत धीमे या कुछ अंशों में क्षयित होते हैं तथा वातावरण को प्रदूषित करते हैं। इस तरह के प्रदूषण के कण हानिकारक होते हैं। ये कण ने केवल एकत्रित होते हैं बल्कि, वे खाद्य क्रम एवं बायो रासायनिक चक्र में घूमते रहते हैं तथा जैविक पदार्थों को भी प्रभावित करते हैं।

प्रदूषण के प्रकार (Types of Pollution in Hindi)

प्रदूषणों को माध्यम की आवश्यकता नहीं होती। ध्वनि प्रदूषण के कण हो सकते हैं तथा विद्युत चुम्बकीय तरंगे भी। जबकि, आज मानव प्रदूषण का मुख्य स्रोत है क्योंकि, प्रकृति के लिए मानव निर्मित-वस्तुओं को कम करने का कोई तरीका नहीं है तथा उनके तत्त्वों को प्राकृतिक चक्र से उन्हें वापस करे। अतः ये वस्तुएं पङी रहेंगी तथा जो वे कर सकती है हानिकर प्रभावों का कारण बनेंगी।

प्रदूषण प्रकृति प्रदत्त हो सकता है जो प्राकृतिक प्रक्रिया से, जैसे – जंगलों का जलना, प्राकृतिक जैवों एवं अजैवों का क्षय होना, ज्वालामुखी विस्फोट, भूकम्प आदि अथवा कृत्रिम प्रदूषण – जो मानव क्रियाओं से उत्पन्न होता है।

पर्यावरण के अनुसार प्रदूषण को तीन भागों में बांटा जा सकता है –

  1. वायु प्रदूषण (Air Pollution)
  2. जल प्रदूषण (Water Pollution)
  3. भूमि या मिट्टी प्रदूषण (Land Pollution)
  • प्रदूषणों के आधार पर इनकी संख्या अनेक है जिनमें से कुछ यहां दिये जा रहे हैं –
  1. रेडियो एक्टिव प्रदूषण (Radio active pollution)
  2. जीव हत्या प्रदूषण (Killing pollution)
  3. थर्मल प्रदूषण (Thermal pollution)
  4. मैरिन प्रदूषण (Marin Pollution)
  5. स्मोग प्रदूषण (Smog pollution)
  6. औद्योगिक प्रदूषण (industrial pollution)
  7. ड्रग्स प्रदूषण (Drugs pollution)
  8. साबुन एवं डिटजेंड प्रदूषण (Soap and Detergent Pollution)
  9. जैविक प्रदूषण (Organic pollution)
  10. अम्लीय वर्षा प्रदूषण (Acid rain pollution)
  11. सीवेज प्रदूषण (Sewage pollution)
  12. ध्वनि प्रदूषण (Noise pollution)
  13. प्लास्टिक प्रदूषण (Plastic pollution)
  14. धूम्रपान प्रदूषण (Smoke pollution)
  15. रासायनिक प्रदूषण (Chemical pollution)
  16. धातु-विषैला प्रदूषण (Metal poisoning)
  17. सामुद्रिक प्रदूषण (Marine pollution)
  18. तेल प्रदूषण (Oil pollution)
  19. रेत प्रदूषण (Sand pollution)
  20. धारा प्रदूषण (Stream pollution)

वायु प्रदूषण (Air Pollution in Hindi)

Air Pollution in Hindi

1. प्राकृतिक स्रोत (Natural source)

वायु प्रदूषण के प्राकृतिक स्रोत-ज्वालामुखी विस्फोट से निकली विषैली गैसें, जंगल की आग, प्राकृतिक जैव एवं अजैव पदार्थों का क्षय, वनस्पति क्षय, तैल, गैसें, रेत एवं धूल से भरी हवा, अतिरिक्त लौकिक जीव, कास्मिक डस्ट, फूलों की पंखुङिया आदि हैं। ये सभी प्राकृतिक ढंग से उत्पादित एवं वायु में उन्मुक्त किये जाते हैं एवं स्वास्थ्य एवं हरे पौधों के लिए वायु में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा में अधिक वृद्धिकर वायु को दूषित एवं खतरनाक बनाते हैं।

2. मानव निर्मित स्रोत  (Man Made Source)

मानव निर्मित स्रोतों में जैसे – जनसंख्या में वृद्धि, जंगलों की कटाई, अग्नि एवं उत्खनित ईंधनों का जलना, मोटर-गाङियों से निकले धुएं, तीव्र औद्योगिकरण, कृषि सम्बंधी क्रियाएं एवं युद्ध वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं।

  • जनसंख्या में वृद्धि (Increase in population)

जनसंख्या विस्फोट वायु प्रदूषण का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। यदि यह वृद्धि दर इसी तरह से बनी रही तो प्रत्येक 35 वर्षों के पश्चात प्रदूषण दो गुना हो जाएगा। जनसंख्या वृद्धि वातावरण की दशा को खराब करने के साथ-साथ अनेक गम्भीर समस्याओं को भी जन्म देती है। जनसंख्या में वृद्धि जंगली जीवों एवं वनों के विस्तार की कमी में भी भागीदार है।

  • अग्नि एवं उत्खनित ईंधनों का जलना (Burning of fire and quenched fuels)

ऊर्जा के प्रमुख स्रोत लकङी, कोयला एवं उत्खनित-ईंधन इत्यादि हैं। लगभग 97 प्रतिशत ऊर्जा का हम अपने घरों एवं फैक्ट्रियों में उपयोग करते हैं जो कोयला, खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस से उत्पादित होती हैं, जिसे उत्खनित ईंधन कहते हैं। कोयला भूमि के अन्दर दबे पौधों के अपशिष्ट का परिवर्तित रूप है जबकि तेल एवं गैस झीलों एवं समुद्रों में रहने वाले छोटे पौधों एवं जानवरों के अपशिष्ट रूप हैं। तेल एवं गैस कोयले की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वे बाहर निकालने एवं वजन के हिसाब से बहुत आसान हैं, वे अधिक से अधिक गर्मी पैदा करते हैं, इन स्रोतों का जलना वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है।

  • मोटर-गाङियों से निकले उद्गार (Ejections from motor vehicles)

मोटर-गाङियों से निकले धुएं कुल वायु प्रदूषण के 75 प्रतिशत से भी अधिक प्रदूषण के उत्तरदायी हैं। मोटर-गाङियां जैसे – कार, बस, स्कूटर, मोटर, टैक्सी, ट्रक आदि जहरीली गैसों की काफी मात्रा उन्मुक्त करते हैं। कार्बन डाईऑक्साइड – (लगभग 77 प्रतिशत), नाइट्रोजन ऑक्साइड (लगभग 8 प्रतिशत ) एवं हाइड्रोकार्बन (लगभग 14 प्रतिशत), शीशायुक्त गैसों एवं विशेष रूप से शीशा के अलावा। परिणामतः डीजल एवं पेट्रोल का अपूर्ण दाह सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में नाइट्रोजन ऑक्साइड से प्रतिक्रिया करता है जिससे वातावरण में फोटो केमिकल स्मोग का निर्माण होता है। यह स्मोग प्रकृति में बहुत विषैला होता है।

  • तीव्र औद्योगिकरण (Rapid industrialization)

उद्योगों की विशाल संख्या जैसे रसायन उद्योग, पेपर एवं पल्प मिल, सूती मिल, धात्विक कम्पनिया, पेट्रोल रिफायनरी, उत्खनन, एवं सिन्थेटिक रबर उद्योग आदि वायु प्रदूषण के लिए 20 प्रतिशत (लगभग) जिम्मेदार है। इन उद्योगों से विभिन्न प्रकार की आर्गेनिक, इनआर्गेनिक गैसें एवं सामग्रियां धुएं के रूप में निकलते हैं। अधिकतर प्रदूषण के कण CO2, CO, SO2, H2S, NO, NO2 आदि के होते हैं।

इनकी चिमनियों से निकलने वाले धुओं में धूल के कण, कार्बन, धातुएं, अन्य ठोस, द्रव एवं रेडियो एक्टिव सामग्री मिली होते हैं जो वायु को प्रदूषित करते हैं। ये सभी गैसें एवं विसर्जित कण मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।

  • कृषि सम्बंधित क्रियाएं (Agricultural activities)

विभिन्न प्रकार की विषैली औषधियां जो कृषि कार्य में उपयोग की जाती हैं भी वायु प्रदूषण के कारक हैं क्योंकि, फसल के ऊपर झिङकाव के दौरान इन जहरीले पदार्थों के कणों की कुछ मात्रा वायु द्वारा विभिन्न स्थानों पर ले जाये जाते हैं। इस प्रकार यह मानव एवं पशुओं के स्वास्थ्य के लिए वायु को दूषित बना देती है।

  • युद्ध-युद्धों में प्रयुक्त विभिन्न प्रकार के मिश्रित विस्फोटो से भी वायु प्रदूषण होता हैै। रेडियोएक्टिव किरणें न्यूक्लियर विस्फोटों एवं आणविक प्रक्रियाओं से निकलती हैं जो वायु को गहराई तक प्रदूषित करती हैं तथा अधिक दूर तक की मानव जाति को नुकसान पहुंचती हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नागासाकी एवं हिरोशिमा पर परमाणु बम के विस्फोटों एवं खाङी युद्ध से हम सब अच्छी तरह परिचित हैं।

जल प्रदूषण (Water Pollution in Hindi)

Water Pollution in Hindi

जल अधिक पर्याप्त एवं आश्चर्यजनक प्राकृतिक स्रोतों में एक है। यह सभी सजीवों के लिए अति आवश्यक तत्त्व है। लेकिन, आज स्वच्छ जल अत्यधिक महंगा सामग्री हो गया है तथा इसका गुण अनेक प्रदूषण के स्रोतों द्वारा विनष्ट हो गया है। जो निम्नवत हैं –

1. सीवेज एवं घरेलू कचरे (Sewage and household waste)

लगभग 75 प्रतिशत जल प्रदूषण सीवेज, घरेलू कचरे एवं फूड प्रोसेसिंग कम्पनियों द्वारा होता है। इसमें मानवीय कूङा, साबुन, डिटरजेंट, धातुएं, शीशा, मिट्टी-रेत के कण, बगीचों के कचेरे वं मैला शामिल हैं। यदि घरेलू कचरा एवं सीवेज की उत्सर्जन के उपरान्त उचित ढंग से व्यवस्था नहीं है अथवा यदि अपशिष्ट सीवेज संसोधन प्लांटों को अन्त में प्राप्त होते हैं तथा वह उपयुक्त स्तर का नहीं है तो जल प्रदूषित होने के अवसर उत्पन्न हो जाते हैं। घरेलू कचरे एवं सीवेज की अव्यवस्थित प्रबंध भूमिगत जल के प्रदूषण का कारण हो सकता है, जैसे कि कुएं। यदि सीवेज लाइन को सीधे नदी से जोङ दिया जाता है तो उस नदी का जल प्रदूषित या गंदा हो जाता है।

  • कस्बों का कचरा जल प्रदूषण का प्रधान कारक है। जल प्रदूषण अनुसंधान प्रयोगशाला, लंदन की शीघ्र प्राप्त रिपोर्ट यह बताती हैं कि सीवेज विषैली धातुओं की बङी मात्रा रखता है सीवेज में विनष्ट न होने वाले जैविक पदार्थ मिले होते हैं जो प्राप्त जल पर ऑक्सीजन की मांग का सम्पादन करता है। आर्गेनिक तत्त्वों में फैटी एसिड, अमीनों अम्ल, एमाइड्स, अमीनों सूगर एवं एमाइन्स मिले होते हैं।
  • अधिकांश नगरों के सीवेज जल में उत्सर्जित्त होने से पूर्व परिशोषित नहीं किये जाते हैं। केवल राजधानी दिल्ली में ही 17 नालों द्वारा 130 टन विषाक्त कचरा प्रतिदिन यमुना नदी में प्रवाहित होता है।

सीवेज एवं घरेलू कचरे के हानिकारक प्रभाव

  • सीवेज बैक्टीरिया, वायरस एवं प्राटोजोआ के विकास के लिए सर्वोत्तम साधन हैं। जो टाईफाइड एवं कोलेरा जैसी बीमारियों के जनक होते हैं।
  • घरेलू सीवेज जिसमें उपयोग में लाये गये जल में शराब, खाद्य-सामग्री, साबुन के कचरे, कागज मिले होते हैं जो जल को अत्यधिक प्रदूषित कर देते हैं।
  • विभिन्न कीङों के लाखा जो परजीवी होते हैं वे पेशाब एवं मल में उत्पन्न हो सकते हैं तथा प्राप्त होने वाले जल को दूषित करते हैं।

2. औद्योगिक अपशिष्ट (Industrial waste)

औद्योगिक अपशिष्ट जल में प्रवाहित किये जाते हैं, जिसमें प्रायः विषैले रसायन, हानिकारक मिश्रण, फिनायल, एल्डिहाइड्स, केटोन, एमाइन, धात्विक कूङा, प्लाटिक्स, विषैले अम्ल, तेल, ग्रीस, डाई, वायोसमूह, ठोस, अजैविक पदार्थ, रेडियोएक्टिव वेस्ट्स एवं थर्मल पावर प्लांट आदि पदार्थ असंख्य उद्योगों से प्रवाहित होते हैं।

  • भारत में जल को प्रदूषित करने वाली कम्पनियों में मुख्यतः ये कम्पनियां आती हैं – रसायन एवं औषधि, कोयला धुलाई, साबुन एवं डिटरजेंट्स, चीनी, कागज, मदिरा, चमङा, स्टील, उर्वरक इत्यादि।
  • ये अपशिष्ट जब सीवेज सिस्टम से प्रवाहित किये जाते हैं तब सीवेज संशोधन तकनीक की शुद्धता को जैविक रूप से विषैला कर देता है जो प्रदूषण की अनेक समस्या को जन्म देता है।

3. कृषि अपशिष्ट (Agricultural waste)

पौद्यों का पोषण, कीटनाशक, खरपतवार नाशक, पीङक नाशक, उर्वरक, खेत के कूङे, नालियां, पौधों एवं जानवरों के अपशिष्ट, मिट्टी का अपरदन मुख्यतः अजैविक सामग्री है जो जल स्रोतों को काफी प्रदूषित करते हैं। आधुनिक कृषि कार्यों में NPK उर्वरकों का उपयोग से मिट्टी में फास्फेट एवं नाइट्रेट की मात्रा मिल जाती है। इनमें कुछ मात्रा वर्षा, सिंचाई एवं नालियों द्वारा घुलकर जल स्रोतों में मिला दी जाती है जहां वे यूकोसिस्टम को अधिकतर नुकसान पहुंचाते हैं। अधिक पौधे पोषकों का उपयोग नाइट्रोजन एवं फास्फोरस के अनुपात को बिगाङता है जिससे जल में पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है।

  • कुछ खरपतवार नाशक औषधियां जल में घुलनशील होती है। परिणामतः जब फसलों पर झिङके जाते हैं, वे मिट्टी पर अधिक समय तक पङे रहते हैं। वर्षा के समय वे कण जल स्रोतों तक पहुंच जाते हैं। इस प्रकार वे प्रदूषण तत्त्व भूमिगत जल को गम्भीर रूप से प्रदूषित करते हैं। विकसित देशों की अपेक्षा भारत में इन रसायनों का बहुत कम उपयोग होता है। जिससे उनका जल स्रोतों में उत्सर्जन भी बहुत कम है। जबकि, कृषि अपशिष्टों को घरेलू सीवेज की तुलना में तीन गुणा अधिक माना जाता है।

4. उर्वरक (Fertilizer)

आधुनिक कृषि कृत्रिम उर्वरकों पर निर्भर है जिसमें कीटनाशक भी आते हैं। यद्यपि, ये रसायन उत्पादन को बढ़ाते है लेकिन वे आन्तरिक प्राकृतिक यूकोसिस्टम को बिगाङ देते हैं। वे जल को बुरी तरह से प्रदूषित करते हैं। NCA ने बताया कि 1976 में उर्वरक के उपयोग में 2.8 मि. टन, 1984 में 6 मि. टन तथा 1995 में 9.7 मि. टन की वृद्धि हुई। भारत लगभग 16 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उर्वरक प्रयोग करता है जबकि विश्व का औसत 55 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है।

उर्वरक का प्रभाव (Fertilizer effect in Hindi)

उर्वरक का प्रभाव – उर्वरक एवं अन्य कृषि रसायन मनुष्य एवं पौधों पर निम्नलिखित प्रभाव डालते हैं –

(क) मनुष्य एवं पशुओं पर प्रभाव (Impact on humans and animals)

उर्वरकों का अधिक उपयोग जल में नाइट्रेट की मात्रा का संचय करता है। जब इस जल का मानव द्वारा उपयोग किया जाता है तब ये नाइट्रेट वैक्टिरिया द्वारा विषाक्त नाइट्राइट लिए कम हो जाते हैं। वे नाइट्राइट बच्चों में गंभीर बीमारी का कारण है। नाइट्राइट रक्त के आक्सीजन वाहक क्षमता में बाधा उत्पन्न करता है तथा श्वसनतंत्र एवं रक्त वाहिका तंत्र को नुकसान पहुँचाता है।

  • सामान्यत: 0.8 प्रतिशत मैथमोग्लोबीन स्वस्थ मनुष्य में रहता लेकिन मैथमोम्लोबीनेमिया नामक बीमारी में यह 10 प्रतिशत तक रक्त में बढ़ता है, जिससे सिरदर्द एवं चक्कर आता है जबकि 60 प्रतिशत से ऊपर होने पर अचेतनता, कठोरता एवं जीवन की समस्या हो सकती है। 80 प्रतिशत मैथमोग्लोबीन होने पर मृत्यु हो जाती है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शीघ्र सूचित किया कि राजस्थान में नाइट्रेट का स्तर 800 mg प्रति लीटर है जो कि आज्ञा देने योग्य सीमा 45 mg प्रति लीटर से काफी अधिक है। गाय एवं अन्य चरने वाले पशुओं में नाइट्रेट की विषाक्तता नागपुर में बतायी गयी है जो नाइट्रेट युक्त मिट्टी में उन्नत सब्जियों के उत्पादन के कारण हैं।

(ख) पौधों पर प्रभाव (Effect on plants)

कृषि उर्वरक मिट्टी के ऊपर सतहों में स्थित महत्त्वपूर्ण पोषकों की भीङ हैं। ह्यूमस युक्त माइक्रोब पौधे की वृद्धि को बढ़ाता है। लेकिन, उर्वरक मिट्टी को समृद्धि बना या अधिक समय के लिए माइक्रोवियल जीवन में सहायता नहीं कर सकता। जहां कम ह्यूमस एवं कम पोषक तत्त्व हो वहां मिट्टी शीघ्रता से हवा या वर्षा द्वारा अपरदित हो सकती है। अतः कई प्रश्न उठ खङे होते हैं – उर्वरक कितना खतरनाक है? क्या वे प्रयोग हेतु सुरक्षित हैं? ⇒क्या वे नुकसान या फायदा करते हैं? क्या उपयोग करें? तथा मिट्टी में उत्पन्न खाद्यान्नों के गुण में क्या वे सुधार कर सकते है।

  • यद्यपि, उर्वरक फसल की कुल उपज बढ़ाते है लेकिन प्रोटीन की कमी के खर्च पर। यह बताया कि 20प्रतिशत -25 प्रतिशत प्रोटीन में कमी प्रकट होती है जब मक्के एवं गेहूं की फसलें NPK उर्वरक के उपयोग से उत्पादित की गयी थी।
  • उर्वरकों के अधिक उपयोग से बङे आकार के फलों एवं सब्जियों को पैदा किया जा सकता है जो विनाशशीलता, कीङों, एवं बीमारियों की अधिक उन्मुख होते हैं।
  • जलयुक्त कृषि अपशिष्ट खनिजों की ग्रहणशीलता को भी रोकता है तथा पौध तंत्र में सम्पूर्ण खनिज चक्र को अव्यवस्थित कर देता है।

5. डिटरजेन्ट (Detergent)

डिटरजेन्ट नवीन उत्पादन हैं जो सफाई कारकों के रूप में उपयोग किये जाते हैं। घरेलू डिटरजेन्ट कई प्रदूषण तत्त्वों से युक्त है जिससे जल स्रोत बुरी तरह प्रभावित होते हैं। वे सतह सक्रिय कारक रखते हैं तथा सोडियम, सोडियम सिलिकेट, सोडियम सल्फेट, एमाइड्स एवं अनेक दूसरे पदार्थ जल में भागीदार होते हैं। वर्तमान समय में सीवेज अधिक मात्रा में सिन्थेटिक डिटरजेंट को धारण करता है।

  • डिटरजेंट से सम्बंधित समस्याएं सन् 1960 वातावरण में देखी गयीं। इनके उपयोग से जल की सतह पर ठोस कणों की पतली परतें बन जाती है जिससे सूर्य की किरणें जल के अंदर प्रवेश नहीं कर पाती हैं परिणामस्वरूप जल में आक्सीजन पर्याप्त मात्रा में घुल नहीं पाता तथा जल प्रदूषित हो जाता है। आक्सीजन की कमी होने से जलीय जन्तुओं एवं वनस्पतियों पर हानिकारक प्रभाव पङता है।

6. विषैली धातुएं (Toxic metals)

विषैली धातुएं औद्योगिक प्रक्रिया, घरेलू, सीवेज प्रवाह, गली के धूलकण, भूमि एवं उत्खनित ईंधनदाह से जलीयतंत्र में जुङे हैं। भारी धातुओं के अवशेष भाग जैसे : Hg, Cd, Pb, As, Co, Mn, Fe एवं Cr आदि जलीय जैवतंत्र के लिए हानिकारक रूप में जाने जाते हैं। विषैली धातुओं से युक्त अपशिष्ट या तो पृथक या सम्मिलित रूप में सभी जीवों के लिए अत्यधिक जहरीले होते हैं। कुछ गम्भीर परिणाम सीसे की विषाक्तता का यूरोप में सामने आया है जिसमें जल की गुणवत्ता बुरी तरह से दूषित हुई।

7. सिल्टेशन (Siltation)

सिल्टेशन पहाङी क्षेत्रों में अत्यधिक विस्तृत एवं हानिकर प्रदूषण तत्व है। ये मिट्टी के कणों से जल में अधिक गन्दगी उत्पन्न करते हैं तथा जलीय जन्तुओं के स्वतंत्र भ्रमण में, मछलियों की वृद्धि एवं उनकी उत्पादकता में बाधा डाल सकते हैं।

8. थर्मल प्रदूषण तत्त्व (Thermal pollution element)

ये प्रदूषण तत्त्व प्रमुख रूप से आणविक, न्यूक्लियर, एवं थर्मल पावर प्लांट से निकले कचरों में होते हैं। थर्मल पावर प्लांटों में प्रवाहित अप्रयुक्त गर्मी सबसे ज्यादा होती है। जो जलीय वातावरण को विपरीत ढंग से प्रभावित करती है।

जल का थर्मल प्रदूषण दो प्रमुख समस्याएं उत्पन्न करता है –

  • उच्च तापमान पर जैविक जीव की क्रिया अधिक होती है तथा इस प्रकार जैसे जल का तापमान बढ़ता है वैसे ही वहां विसर्जित आक्सीजन के लिए मांग अधिक होती है।
  • जैसे-जैसे पानी का तापमान बढ़ता जाता है वैसे-वैसे जल में विसर्जित आक्सीजन की मात्रा कम होती जाती है। यहां उच्च ताप पर विसर्जित आक्सीजन की कम मात्रा जल में उपस्थित होती एवं जैविक प्राणी के लिए प्राणघातक हो सकता है।

थर्मल प्रदूषण के प्रभाव (Effects of thermal pollution)

थर्मल प्रदूषण के प्रभाव – तापमान में वृद्धि जलीय तंत्र में जीवों पर साथ ही साथ जल के गुण पर गहरा प्रभाव डालता है। इनके हानिकारक प्रभाव निम्नांकित हैं –

  • विसर्जित आक्सीजन में कमी।
  • BOD में वृद्धि।
  • मछलियों के अण्डों से शीघ्र बच्चे निकलना।
  • ट्राउट मछली का अण्डों से बच्चे निकालने में असफलता एवं सायन का अण्डे देने में असफलता।
  • ’श्वसन तंत्र, नाङी तंत्र या महत्त्वपूर्ण सेल प्रक्रियाओं में असफलता के कारण सीधे मछलियों की मृत्यु।
  • बसंत के मौसम में उत्पादक तकनीक एवं मछलियों के अण्डे देने पर विपरीत प्रभाव।

9. जल में रेडियोएक्टिव सामग्री (Radioactive material in water)

आज मानव निर्मित स्रोतों ने जल तंत्र में पहले से विद्यमान रेडियोएक्टिव सामग्रियों में विशाल मात्रा में रेडियो न्यूक्लाइड को मिलाने लगा है। जिससे सजीव प्राणी विभिन्न बुरे प्रभावों का आदी हो गया है। रेडियोएक्टिव प्रदूषण तत्त्व जल धारा में विभिन्न स्रोतों से प्रवेश करता है, जैसे – न्यूक्लियर पावर प्लांट, न्यूक्लियर रिऐक्टर, न्यूक्ल्यिर परीक्षण न्यूक्लियर स्थानान्तरण, शान्ति के कार्य सम्पादन आदि। वास्तव में रेडियोएक्टिव से संकट पैदा होता है क्योंकि रेडियोन्यूक्लाइड शरीर के इंद्रियों में जमा होता है तथा प्रकाश की किरणों को वितरित करता है। सर्वाधिक विषैली रेडियोएक्टिव – Pu, Np, Am, Cm, Bk, Cs, Zr, Ru इत्यादि हैं जो परमाणविक ईंधन के बमबार्डमेन्ट न्यूट्रान से उत्पादित होता है। एक बार वे जल तंत्र में पहुंच जाते हैं तो इकोसाइक्लिंग प्रक्रिया को बिगाङ देते हैं।

जल प्रदूषण तत्त्वों का वर्गीकरण

जल प्रदूषण तत्त्वों का वर्गीकरण – जल प्रदूषण निम्नलिखित प्रदूषण तत्त्वों के द्वारा होता है –

  • अजैविक प्रदूषण तत्त्व एवं विषैली धातुएं।
  • जैविक प्रदूषण तत्त्व।
  • जमाव
  • आक्सीजन-जनित-कचरे
  • रेडियोएक्टिव प्रदूषण तत्त्व
  • थर्मल प्रदूषण तत्त्व
  • खरपतवार नाशक प्रदूषण तत्त्व
  • कृषि कचरे एवं उर्वरक
  • मोटर-गाङियों से विसर्जित तत्त्व
  • सिन्थेटिक डिटरजेंट
  • बीमारियों के कारक
  • पौध पोषक
  • जीव-जन्तु प्रदूषण तत्त्व
  • गैसीय प्रदूषण तत्त्व
  • अपशिष्ट पदार्थ

भूमि प्रदूषण (Land Pollution in Hindi)

Land Pollution in Hindi

भूमि प्रदूषण मुख्य रूप से निम्नांकित स्रोतों से होता है –

1. औद्योगिक कूङे-कचरे से भूमि प्रदूषण (Land pollution from industrial waste)

औद्योगिक अपशिष्टों की परिपाटी मृदा प्रदूषण के लिए मुख्य समस्या का उत्तरदायी है। ये प्रदूषण तत्त्व मुख्य रूप से पल्प एवं पेपर मिलों, रसायन उद्योग, तेल शोधनशालाओं, चीनी मिलों, चमङा उद्योगों, टेक्सटाइलों, स्टील, मदिरा, उर्वरक, कीटनाशक दवाओं की कम्पनियां, कोयला एवं खनिज खदान उद्योग, धातु प्रोसेसिंग उद्योगों, औषधियों, शीशा, सीमेंट, पेट्रोलियम एवं इन्जीनियरिंग आदि कम्पनियों से प्रवाहित होती है।

  • नवीन तकनीकी खोज से नये प्रकार के औद्योगिक अपशिष्ट उत्पादित होते है तथा भूमि पर जमा किये जाते हैं। ये अपशिष्ट पदार्थ भूमि प्रदूषण को अत्यधिक बढ़ाते हैं। थर्मल, परमाणु एवं विद्युत शक्ति गृह भी भूमि से प्रदूषण तत्त्वों को जोङने में महत्त्वपूर्ण हैं। इस प्रकार के उद्योगों की भट्टियां ’फ्लाईऐस’ उत्पन्न करती है, जैसे अधजला भूरे-काले कण जो जल, वायु, एवं भूमि को बुरी तरह प्रदूषित करता है। अनेक उद्योगों के अपशिष्ट आस-पास की जमीन पर या तो जलधाराओं या तालाबों में प्रवाहित कर दिये जाते हैं।
  • औद्योगिक अपशिष्ट मुख्यतया जैविक, अजैविक व अन्य दूसरे सामग्रियों से युक्त होता है। ये प्रदूषण तत्त्व मिट्टी के जैविक एवं रासायनिक सम्पतियों को परिवर्तित एवं प्रभावित करते हैं। परिणामतः नुकसानदेह रसायन मिट्टी या जल से मानव के भोजन पदार्थों में प्रवेश कर सकते हैं तथा जैव रसायन प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा सकते हैं। अन्ततः सजीव प्राणियों पर गम्भीर प्रभाव डालते हैं।

2. शहरी कूङे-कचरे से मृदा प्रदूषण (Urban pollution from soil waste)

शहरी कचरे के अन्तर्गत व्यावसायिक एवं घरेलू दोनों के सीवेज के सूखे कीचङ सम्मिलित हैं। सभी शहरी ठोस कचरा सामान्यतः मल के रूप में आरोपित किया जाता है। ठोस कचरा एवं मल विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में भूमि प्रदूषण के जिम्मेदार हैं। यह मल, कूङा-करकट एवं धूल-रेत के कण से सम्बंध रखता है। जैसे प्लास्टिक, शीशा, धातु फाईबर, कागज, गलियों की गन्दगी, ईंधन के अवशिष्ट, पत्तियां, कन्टेनर, परित्यक्त मोटर-गाङियां एवं दूसरे घृणित उत्पादित वस्तुएं।

  • ⇒शहरी घरेलू कचरा यद्यपि, औद्योगिक कचरों से पृथक रूप से विभाजित, अत्यधिक खतरनाक होता है। क्योंकि, वे आसानी से क्षयित नहीं किये जा सकते हैं। जनसंख्या एवं बढ़ती आवश्यकता के कारण घरेलू कचरे की समस्या पूर्णतः परिवर्तित हो गयी है। आज इसमें अवशेष वस्तु, कागज, प्लास्टिक एवं अन्य खतरनाक रसायन शामिल हो गये हैं। अन्य चीजें जैसे पेंट एवं वार्निश जो रंगों में मिलाने के काम आते हैं ये भी मृदा प्रदूषण के लिए समस्या पैदा करते हैं।
  • शहरी क्षेत्रों में प्रदूषण की अवस्थिति इन क्षेत्रों के अन्दर एवं चारों तरफ अनियोजित औद्योगिक प्रगति भारत में भूमि प्रदूषण के लिए अधिक मात्रा में भागीदार हैं। लगभग 12 करोङ भारत की जनसंख्या शहरों में है जबकि, इससे छः गुना अधिक जनसंख्या गांवों में रहती है जो अपने कूङे-कचरे मिट्टी में डालती है, जो जलीय एवं स्थलीय प्रदूषण के लिए खतरनाक है। यह अनुमान लगाया गया है कि 20 करोङ रुपये केवल बाम्बे एवं कोलकाता के मल को विनष्ट करने में खर्च हुआ है।

3. रेडियोएक्टिव प्रदूषण तत्त्व (Radioactive pollution element)

रेडियोएक्टिव के कण न्यूक्लियर साधनों के विस्फोट के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं। न्यूक्लिर धूल कण एवं रेडियोएक्टिव कूङे-कचरे से वातावरण प्रभावित होता है। ये कण मिट्टी में मिलकर मिट्टी को प्रदूषित कर देते हैं। रेडियम, थोरियम, यूरेनियम, पोटैशियम आइसोटोप्स एवं कार्बन के रेडियो न्यूक्लाइड मिट्टी, चट्टान, जल एवं वायु में बहुत सामान्य है। हाइड्रोजन बमों का एवं कास्मिक रेडिएशन न्यूट्रान-प्रोटान प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करते हैं जिससे नाइट्रोजन C-14 उत्पादित करता है यह C-14 पौधों के कार्बन मेटाबोलिज्म में हिस्सा लेता है जो मानव एवं पशु को प्रभावित करता है।

4. कृषि से संबंधित कार्य (Agricultural work)

आधुनिक कृषि क्रियाएं मिट्टी को अधिक मात्रा में प्रदूषित करती है। आज एग्रो तकनीक के विस्तार से, उर्वरकों की विशाल मात्रा, खरपतवार नाशक, कीटनाशक, औषधियां तथा मृदा स्थितिक कारक फसल की उपज बढ़ाने के लिए प्रयोग किये जाते हैं। अनेक कृषि क्षेत्र पौधों एवं जानवरों के कूङे-कचरे की विशाल मात्रा से भरे पङे हैं जो मृदा प्रदूषण की समस्या पैदा करते हैं। इनके अतिरिक्त कृषि अपशिष्ट, खाद के अपशिष्ट अंश, मृदा अपरदन अजैविक रसायनों से युक्त-ये भूमि प्रदूषण के कारण बताये गये हैं। अकेले यू.एस.ए. प्रति वर्ष 18 मिलियन टन कृषि से सम्बंधित कचरा उत्पन्न करता है।

  • इन दिनों कृषि क्रियाएं अधिकतर कृत्रिम उर्वरकों पर ही निर्भर है, जो सामान्यतः एक या दो पौधों के पोषक तत्त्वों से युक्त होते हैं। जैसे – नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटैशियम। संकटमय प्रदूषण समस्याएं इनके अधिक प्रयोग से मुख्यतया पैदा होती हैं। यदि उर्वरक मिट्टी को उर्वर बनाने के लिए प्रयोग किये जाते हैं फिर भी वे अपनी अशुद्धता के कारण मिट्टी को गन्दा या दूषित बना देते हैं। जब उर्वरक अन्य सिथेटिक आर्गेनिक प्रदूषण तत्त्वों को गन्दा बनाता है तब मिट्टी में उपस्थित जल भी प्रदूषित हो जाता है।
  • सामान्यतः उर्वरक मिट्टी एवं फसलों द्वारा मुख्यरूप से धारित किये जाते हैं। विशेषता गीले जमीन पर वर्षा के मौसम में उर्वरक का उपयोग करने से नाइट्रेट के बह जाने की संभावना रहती हैं। ये नाइट्रेट बहकर नदियों एवं झीलों में चले जाते हैं। तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकार प्रभाव छोङते हैं। इस प्रकार उर्वरकों के उपयोग से अनेक अन्य स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याएं एवं मिट्टी के प्रदूषण की समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।

जनसंख्या के घनत्व में वृद्धि के कारण खाद्यान्न उत्पादन वृद्धि की समस्या उत्पन्न होती है।

  • परिणामस्वरूप भूमि स्रोत दूषित होता है। क्योंकि, इस परिस्थिति में मनुष्य कीटनाशी एवं खरपतवार नाशक औषधियों के उपयोग से फसल की रक्षा करता है। इन विषैली औषधियों में अनेक प्रकार के रसायन मिले होते हैं जो पानी के साथ अवशोषित होकर मिट्टी में पहुंच जाते हैं तथा मिट्टी को प्रदूषित कर देते हैं। इसका परिणाम यह होता है मानव एवं अन्य दूसरे जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों का जीवन अत्यधिक प्रभावित होता है। वे विभिन्न प्रकार के रोगों के शिकार हो जाते हैं, अन्ततोगत्वा मृत्यु के काल से बचना असंभव हो जाता है।

5. रासायनिक एवं धात्विक प्रदूषण तत्त्व (Chemical and Metallic Pollution Elements)

असंख्य टेक्सटाइल उद्योग कीटनाशी, पेन्ट, डाई, साबुन, सिंथेटिक डिटरजेंट, चमङा, ड्रग्स, बैटरी, सीमेंट, ऐस्वेस्टस, रबर, पेट्रोलियम, कागज, चीनी, स्टील, शीशा, इलेक्ट्रोप्लेटिंग एवं धातु उद्योग आदि अपने हानिकारक अपशिष्ट जल एवं भूमि में उङेलते है जिससे जल जनित भयानक प्रभाव सजीव प्राणियों पर पङते हैं।

  • सिंथेटिक रसायन और उर्वरक अवशेष धातुओं के स्रोत हैं जो मिट्टी में मिलकर उसे दूषित करते हैं। इसी प्रकार सीलेनियम, सिलेनाइट आयन आदि हैं जो पर्यावरण प्रदूषण के लिए प्रमुख जिम्मेदार हैं। आज विभिन्न प्रकार के अवशेष तत्त्व जैसे – Fe, Co, Ne, Cu, Zn, Ba, Pb, Mn, As, Hg, Mo, Si एक अथवा दूसरे रूप में मृदा में मिले रहते हैं। अधिकांश मिट्टी में 50 से 100 प्रतिशत कार्बन जैव व अजैव घटकों के साथ कीचङ से मिले पाये जाते हैं। जो मिट्टी के निर्माण को प्रभावित करते हैं। धात्विक गन्दगी मिट्टी में मिलकर वातावरणीय आक्सीजन को प्रभावित करता है, जो सजीव प्राणियों के लिए खतरनाक है।

तापीय प्रदूषण (Thermal Pollution in Hindi)

Thermal Pollution in Hindi

तापीय प्रदूषण का अर्थ है – वायुमण्डल के तापमान कारकों के तापमान में अवांछित वृद्धि। तापीय प्रदूषण को दो तरह से देखा जा सकता है – वायुमण्डलीय तापीय प्रदूषण व जल तापीय प्रदूषण। वैश्विक तापवृद्धि एक ज्वलंत पर्यावरणीय समस्या है।

वायुमण्डलीय तापीय प्रदूषण के कारण कौन-कौनसे है ?

  • उद्योगों से निकलने वाले धूएँ में उपस्थित विभिन्न गैसों की अधिकता।
  • ग्रीन हाऊस गैस, कार्बन डाई ऑक्साइड, मिथेन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, नाइट्रस ऑक्साइड आदि की विश्व स्तर पर वायुमण्डल में बढ़ोत्तरी।
  • वाहनों की संख्या में, विश्व स्तर पर होने वाली बढ़ोत्तरी से।
  • प्रशीतक उपकरण, वायुयानों में प्रशीतकों के प्रयोगों से छोड़े गए क्लौरो फ्लौरो कार्बन गैस के कारण।
  • विलायकों पर आधारित उद्योगों से छोड़े गए कार्बन टेट्राक्लोराइड, निलाईल क्लोरोफाॅर्म आदि के वाष्प द्वारा।

जल तापीय प्रदूषण के कारण कौन-कौनसे है ?

  • उद्योगों द्वारा, गर्म औद्योगिक अपशिष्टों को जल में छोड़ा जाना।
  • प्रदूषित जल की सतह पर उपस्थित पदार्थों द्वारा अधिकता में ताप का अवशोषण।

तापीय प्रदूषण के प्रभाव (Effects of thermal pollution)

  • ओजान गैस की रक्षक परत का क्षय
  • प्राकृतिक प्रकोपों में वृद्धि
  • पर्यावरण में ऑक्सीजन की कमी।
  • ध्रुवीय प्रदेशों की बर्फ का पिघलना।
  • समुद्र के जल स्तर में वृद्धि
  • जलचक्र में परिवर्तन से कहीं भीषण सूखा, तो कहीं बाढ़।
  • कृषि भूमि में कमी
  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के सेंटर फाॅर एटमोस्फियरिक साइंसेज द्वारा कराए गए अध्ययन के अनुसार तापीय प्रदूषण का खतरा भारत जैसे उष्ण कटिबंधीय देशों पर होगा।
  • हिमालय के शिखरों पर जमी बर्फ पिघलने से समुद्र तल के ऊँचा होने व तटीय क्षेत्रों के डूबने का खतरा।
  • उड़ीसा और बंगाल की खाड़ी के तटों पर तूफान का खतरा अधिक।
  • मौसम, छोटे व असंभावित होंगें।
  • जलाशयों के तापमान में वृद्धि से जल तंत्रों को हानि।

तापीय प्रदूषण के नियंत्रण के लिए किस प्रकार के राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय प्रयास किए गए है ?

  • मांट्रियल घोषणा-16 सितम्बर, 1987 में चरणबद्ध रूप में ओजोन परत को क्षति पहुँचाने वाले पदार्थों के प्रयोग पर रोक।
  • इसके लिए 1990 में लंदन तथा 1992 में बीजिंग में सम्मेलन हुए।
  • वैश्विक ताप वृद्धि में औद्योगिकरण का बड़ा हाथ है। खासकर जो विकसित देश इसके लिए जिम्मेदार हैं। वायु में ग्रीन हाउस गैसें कम-से-कम मात्रा में छोड़ी जाए।
  • वृक्षारोपण अधिक करें। जिसमें कार्बन डाईऑक्साइड अधिक से अधिक काम आ जाए व वायुमंडल ठण्डा रहें।

नाभिकीय प्रदूषण (Nuclear Pollution in Hindi)

Nuclear Pollution in Hindi

रेडियोधर्मी तत्व जहाँ भी होते हैं, धीरे-धीरे विखंडित होते रहते हैं व पर्यावरण, मानव, जीव व वनस्पति जगत को स्थायी नुकसान पहुंचाते है। इनके खनन, उपयोग, संचय व निस्तारण में हर प्रकार की सावधानी न बरती जाए तो ये बहुत ही हानिकारक हो सकते है।

नाभिकीय प्रदूषण के क्या कारण है ?

  • यूरेनियम, थोरियम आदि नाभिकीय प्रक्रियाओं में काम आने वाले तत्त्व हैं। इनके खनन के समय प्रदूषण होता है।
  • समस्थानिकों के उत्पादन के समय अपशिष्ट पदार्था के रूम में नाभिकीय प्रदूषण होता है।
  • परमाणु शक्ति द्वारा विद्युत उत्पादन संयंत्रों में
  • नाभिकीय रिएक्टरों से।
  • नाभिकीय हथियारों के बनने व उपयोग के दौरान।
  • रेडियो ट्रेसरों का प्रयोग दवा, अस्पतालों और जीव विज्ञान में होता है। Cu-63 I125 मत्वपूर्ण रेडियो आइसोटोप है। इनके उपयोग के समय भी प्रदूषण हो सकता है।

नाभिकीय प्रदूषण के प्रभाव (Effects of nuclear pollution)

  • परमाणु परीक्षणों के दौरान रेडियो सक्रिय पदार्थ दूर-दूर तक फैल जाते है। ये मिट्टी के माध्यम से पौधों में मनुष्य की या जीव-जंतुओं की खाद्य-श्रृंखला में प्रवेश कर जाते है।
  • डी.एन.ए. को नष्ट करते हैं तथा केट्रेक्ट व ल्यूकेनिया जैसी बीमारियाँ पैदा करते है।
  • रेडियोधर्मी तत्व जीवों के प्रोटीन से क्रिया कर एन्जाइमों आदि को नष्ट करके उनकी वृद्धि को ही रोक देते हैं।
  • असामान्य शिशुओं का जन्म, त्वचा रोग आदि रेडियोधर्मी विकिरणों के प्रभाव से होता है।
  • यदि पानी के साथ ये मानव शरीर में चले जाऐं तो आमाशय में खराबी, जेनेटिक परिवर्तन आदि हो सकता है।
  • रेडियोधर्मी प्रदूषण का प्रभाव धीरे-धीरे कई वर्षों में लकवे, बहरापन, गूँगापन आदि के रूप में दिखाई देता है।
  • हड्डियों में विकृतियाँ, मंदबुद्धिता भी रेडियोधर्मी विकिरणों से होती है।

नाभिकीय प्रदूषण को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है ?

कई दुष्प्रभावों के उपरान्त रेडियोधर्मी तत्व में निहित असीमित ऊर्जा के कारण इनका उपयोग आज आवश्यक है। निम्न कुछ उपायों से इनके हानिकारक प्रभावों से बचा जा सकता है :

  • रेडियोधर्मी तत्वों में खनन व उपयोग के समय कम-से-कम बिखराव हो।
  • इनके खनन में गीली विधि को काम में लिया जाए।
  • इनका संरक्षण व संचय इस प्रकार हो कि इनके विकिरण यूँ ही न फैलें।
  • उद्योगों में इस प्रकार के अपशिष्टों को अत्यधिक ऊँचाई पर न छोड़ा जाए।
  • जहाँ तक हो उच्च रेडियोधर्मिता वाले पदार्थों का समुद्र, नदी, जल आदि में विसर्जित न किया जाए।
  • ⇒जहाँ तक हो स्रोत से दूर रहा जाए।
  • जहाँ ये नाभिक काम आते हैं, वहाँ कार्य जल्दी खत्म होना चाहिए, जैसे-अधिक व्यक्ति व समय कम, जिससे प्रति व्यक्ति उद्भासन कम-से-कम हो।
  • इन विकिरणों से प्रभावित कक्ष में विशेष मास्क, सूट, बूट, ओवरकोट, दस्ताने आदि का प्रयोग अवश्क हो।

समुद्री प्रदूषण (Marine Pollution in Hindi)

तो दोस्तो अब हम बात करने वाले है समुद्री प्रदूषण के बारे में कि आखिर समुद्री प्रदूषण कैसे होता है ? दोस्तो समुद्र को यातायात का सबसे सस्ता माध्यम माना जाता है। इसी के कारण आज बहुत से बड़े-बड़े जहाज समुद्र से होकर एक देश से दूसरे देश में सामग्री का आदान-प्रदान करने के लिए प्रयुक्त किए गए है। और भारी में आवश्यक सामग्री को एक स्थान से दूसरे स्थान तक समुद्र मार्ग से लाया जा रहा है।

  • परन्तु अपने हित को देखते हुए। हम यह भूल ही जाते है। कि हमारी प्रकृति हमारे इन क्रियाओं से खुश है या नहीं। बस यहीं सोचने का विषय है कि हम प्रकृति को निरस छोड़ कर अपने हित के बारे में सोचते है। तो चलिए अब जाने कि क्या कारण है जिससे समुद्री प्रदूषण होता है ?

दोस्तो समुद्र के मार्ग से भारी मात्रा में तेल आयात और निर्वात किया जाता है। जिसमें कई बार ऐसा होता है। कि समुद्री जहाज समुद्र में ही खूब जाता है। और इन जहाजों में लाया गया तेल समुद्र में फैल जाता है। जिससे समुद्र में रखने वाले जीवों की मृत्यु हो जाती है। और समुद्र प्रदूषित हो जाता है। इस तरह से फैल तेल में जब जहाज की आग के चिथड़े गिरते है तो समुद्र में आग लग जाती है। जिससे समुद्र के जीवों की भारी मात्रा में मृत्यु हो जाती है। जिससे समुद्री प्रदूषण होता है।

  • कल-कारखानों के द्वारा अवांछित लोहा, जिंक, सीसा, क्रोमियम, बेरियम आदि को बिना निसक्रिय किए। समुद्र में बहा दिया जाता है। जो समुद्री जीवों और मानव पर बूरा प्रभाव डालता है।

इसके अलावा बहुत से लोग ऐसे भी है जो अक्सर अपने शोक के लिए समुद्र में बोटिंग करते है। और अपने शोंक को पूरा करने की लालसा में प्रकृति के हित को भूल जाते है। और समुद्र में अवांछित पदार्थ भी बहा देते है। जिससे समुद्री प्रदूषण होता है।

समुद्री प्रदूषण के क्या कारण है ?

  • समुद्र में होने वाले जहाजों के हादसों के कारण जल प्रदूषण होता है।
  • तैलीय प्रदूषण भी एक ज्वलत मूद्दा है जो सागरीय प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण रहा है।
  • आयात-निर्यात में प्रयुक्त जहाजों के डूबने से समुद्री प्रदूषण होता है।
  • कल-कारखानों के द्वारा अपशिष्ट पदार्थों को भारी में मात्रा में समुद्र में बहा दिया जाता है। जिससे समुद्री प्रदूषण होता है।
  • शहरों के साथ सटे समुद्रों में अक्सर शहरवासियों के द्वारा अपशिष्ट को समुद्र जल में बहा दिया जाता है। जिससे समुद्री प्रदूषण होता है।
  • समुद्र में लगे संयंत्रों के कारण भी समुद्री प्रदूषण होता है।

समुद्री प्रदूषण के प्रभाव (Effects of marine pollution)

  • जलीय संपदा का हास होता है।
  • समुद्र में रहने वाले जलीय प्राणियों की मृत्यु हो जाती है।
  • तेलीय पदार्थों के जल में बहाव से समुद्र में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।
  • मनुष्य के द्वारा समुद्र में नहाने की प्रक्रिया को अपनाया गया है। अगर हमारे द्वारा अशुद्ध जल में स्नान किया जाए। तो हम चर्म रोग या अन्य त्वचा संबंधी रोग हो सकते है।
  • समुद्र में से मछुआरों के द्वारा मछलियों को बाजार में बेचने के लिए लाया जाता है। अगर समुद्र के दुषित जल की मछली का हम सेवन करते है। तो हमारे शरीर में अनेक प्रकार की बिमारियाँ उत्पन्न हो सकती है।
  • समुद्री प्रदूषण प्राकृतिक संपदा के हास का भी कारण बन सकता है।

किस प्रकार समुद्री प्रदूषण निंयत्रण को नियंत्रित किया जा सकता है ?

  • समुद्र से सटे शहरों पर विशेष प्रकार के कानून लागू करना। ताकि वांछित पदार्थों को समुद्र में बहाए जाने पर प्रतिबद्ध लगया जा सके।
  • तेलिय संसाधनों के परिवहन में विशेष सावधानियों को अपनाना। एवं विशेष निधियों को अपनाया जाना।
  • समुद्री प्रदूषण को रोकने हेतु विशेष प्रकार के निति निर्धारित तत्वों को विश्व स्तर पर लागू करना।
  • जन जागरूकता अभियान चलाए जाना।
  • समुद्र मंथन द्वारा तेलीय पदार्थों को निस्तारण करना।

ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution in Hindi)

Noise Pollution in Hindi

दोस्तो ध्वनि प्रदूषण को आप अपने चारों ओर ही महसूस कर सकते हो। अगर आप देखेंगें तो आपको महसूस होगा। कि वाकई हमारे चारों और ध्वनि का प्रदूषण बहुत है। आज बढती जनसंख्या इसका एक प्रमुख कारण बन गई है। जिसके कारण ध्वनि की तीव्रता बढ़ती ही जा रही है। लोग खुद के मजे के लिए दूसरों को नुकसान पहुँचाते है। किसी को सोने नहीं देते है। तो कभी किसी को बहरा ही बना देते है। अब आपको यह तो पता ही लग गया होगा कि हम लाउड स्पीकरस की बात कर रहे है। जो आज ध्वनि प्रदूषण के मामले में सबसे आगे है।

  • वायुयान के उडने, ट्रेन के चलने, ट्रेफिक, बस के हाॅर्न, लाउड स्पीकरस, ट्रक के हाॅर्न की आवाज, वैज्ञानिक परिक्षाणों आदि सभी से ध्वनि प्रदूषण होता है। जिन्हें आप अपने चारों ओर देख ही सकते है।

 

  • किसी ध्वनि का हमारी श्रव्य क्षमता से अधिक होना। हमें बहरा भी बना सकता है। और अत्यधिक शोर से हमारा मानसिक संतुलन भी बिगड़ जाता है। यह ध्वनि प्रदूषण घरों की दिवारों को भी कमजोर बना देता है।

ध्वनि प्रदूषण उत्पन्न करने वाले कारक (Noise generating factors)

  • बादलों के गरजने से
  • धरती पर बिजली गिरने से
  • ट्रेन के चलने से
  • वायुयान के उड़ने से
  • आवागमन के साधनों से
  • औद्योगिक कारखानों से
  • मशिनों के चलने से
  • निर्माण कार्यों के चलने से
  • वैज्ञानिक परिक्षणों से
  • मंनोरजन से संसाधनों से
  • मानवीय क्रियकलापों आदि से ध्वनि प्रदूषण होता है।

ध्वनि प्रदूषण का प्रभाव (Effects of noise pollution)

  • अत्यधिक ध्वनि जो मानव के श्रव्य क्षमता से अधिक हो, मानव को बहरा बना सकती है।
  • अगर हम किसी शहर में सड़क के किनारे रहते है। तो अत्यधिक शोर के कारण हमारा मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है।
  • अनिन्द्रा का कारण भी ध्वनि प्रदूषण हो सकता है।
  • लाउड स्पीकर किसी के लिए मौज का कारण और किसी के लिए सजा का कारण बन सकते है।
  • अक्सर जिन घरों में लाउड स्पीकर अत्यधिक तेज आवाज में बजते है। उन घरों की दिवारे कमजोर हो जाती है।
  • ध्वनि प्रदूषण से मनुष्य में चिड़चिड़ापन, थकान, सिरदर्द आदि पैदा हो जाते है।
  • अत्यधिक शोर मनुष्य को उसकी एकाग्रता से दूर कर देता है।
  • कल-कारखानो, उद्योगों, फैक्टरियों आदि से उत्पन्न होने वाला शोर प्रकृति की चेतना को भंग कर देता है। जिससे मानव जीवन भी अत्यधिक प्रभावित रहता है।
  • पशु-पक्षियों पर भी अंवाछित ध्वनि का विपरित अवसर पड़ता है।

ध्वनि प्रदूषण रोकने के उपाय

  • वाहनों की स्वच्छता के लिए कानून बनाए जाने चाहिए।
  • मशीनों और उद्योगिक कारखानों में सुधार लाना।
  • हवाइअड्डों और बस स्टेशन पर ध्वनि सीमा को लागू करना।
  • विविध प्रकार के ध्वनि सीमा नियंत्रण नियमों को लागू करना।
  • जन-जागरूक अभियान चलाना।
  • स्वयं जागरूक होना। और कम से कम वाहन का उपयोग में लाना।

Essay on Pollution in Hindi

 

पर्यावरण प्रदूषण निबंध

निबंध : 1

पर्यावरण प्रदूषण: कारण और निवारण
अथवा
पर्यावरण प्रदूषण: विकट समस्या

संकेत बिंदू

  • पर्यावरण क्या है ?
  • पर्यावरण प्रदूषण के विविध प्रकार
  • पर्यावरण प्रदूषण के कुप्रभाव
  • निवारण के उपाय
  • सामूहिक प्रयास आवश्यक

पर्यावरण क्या है ?

आकाश, वायु, भूमि, जल, हरियाली, पर्वत आदि मिलकर हमारा पर्यावरण बनाते है। ये सभी प्राकृतिक अंग हमारे स्वस्थ और सुखी जीवन का आधार है। दुर्भाग्य से मनुष्य ने इस पर्यावरण को दूषित और कुरूप बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। आज संसार पर्यावरण प्रदूषण से परेशान है।

पर्यावरण प्रदूषण के विविध प्रकार

आज पर्यावरण का कोई भी अंग प्रदूषण से नहीं बचा है। प्रदूषण के प्रमुख स्वरूप इस प्रकार है –

  1. जल प्रदूषण
  2. वायु प्रदूषण
  3. खाद्य प्रदूषण
  4. ध्वनि प्रदूषण
  5. भूमि और आकाशीय प्रदूषण
जल प्रदूषण :

कल-कारखानों से निकलने वाले कचरे और हानिकारक रसायनों ने नदी, तालाब, वर्षा-जल यहाँ तक कि भमिगत जल को भी प्रदूषित कर दयिा है।

वायु प्रदूषण :

वायु भी प्रदूषण से नहीं बची है। वाहनों और कारखानों से निकलने वाली हानिकारक गैसें वायुमण्डल को विषैला बना रही है।

खाद्य प्रदूषण :

प्रदूषित जल, वायु और कीटनाशक पदार्थों ने अनाज, शाक-सब्जी, फल और माँस सभी को अखाद्य बना दिया है।

ध्वनि प्रदूषण :

शोर हमें बहरा कर रहा है। इससे बरापन, मानसिक तनाव तथा हृदय रोगों में वृद्धि हो रही है।

भूमि और आकाशीय प्रदूषण :

बस्तियों से निकलने वाला गंदा पानी, कूड़े के ढेरों तथा भूमि में रिसने वाले कारखानों के विषैले रसायनों ने भूमि के ऊपरी तल तथा भू-गर्भ को प्रदूषित कर डाला है। विषैली गैसों के निंरतर उत्सर्जन से आकाश प्रदूषित है। भूमि-प्रदूषण में प्लास्टिक व पाॅलिथिन का बढ़ता प्रचलन एक अहम् कारण है। यह भूमि की उर्वरा-शक्ति को नष्ट कर रहा है।

पर्यावरण प्रदूषण के कुप्रभाव

इस सर्वव्यापी प्रदूषण ने मानव ही नहीं सम्पूर्ण जीवधारियों के जीवन को संकटमय बना दिया है। इससे मनुष्यों में रोगों का सामना करने की क्षमता घटती जा रही हैं। नए-नए घातक रोग उत्पन्न हो रहे है। बाढ़, भूमि का क्षरण, ऋतु-चक्र का असंतुलन, रेगिस्तानों की वृद्धि और भूमण्डल के तापमान में वृद्धि जैसे घोर संकट मानव-सभ्यता के भविष्य को अंधकारमय बना रहे हैं।

निवारण के उपाय

पर्यावरण प्रदूषण का संकट मनुष्य द्वारा ही उत्पन्न किया गया है, अतः मानव के आत्म नियंत्रण से ही यह संकट दूर हो सकता है। वाहनों के इंजनों में सुधार, बैटरी चालित दोपहिया वाहनों के प्रयोग, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर नियंत्रण तथा प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर रोक द्वारा प्रदूषण पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

सामूहिक प्रयास आवश्यक

विकसित देश ही प्रदूषण के बढ़ते जाने के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं। कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैस जो वायु प्रदूषण तथा तापमान-वृद्धि का प्रमुख कारण है, विकसित देशों द्वारा ही सर्वाधिक उत्पन्न की जा रही है। ये देश विकासशील देशों द्वारा प्रदूषण-नियंत्रण पर जोर देते हैं, स्वयं उस पर अम्ल नहीं करना चाहते। पर्यावरण-प्रदूषण विश्वव्यापी समस्या है। सभी देशों के प्रयास से इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

प्रदूषण पर निबंध

Pollution essay in Hindi

निबंध : 2

पर्यावरण संरक्षण: प्रदूषण नियंत्रण
अथवा
पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता

संकेत बिन्दू

  • प्रस्तावना
  • पर्यावरण संरक्षण
  • पर्यावरण प्रदूषण
  • पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार
  • प्रदूषण नियंत्राण
  • उपसंहार

प्रस्तावना

मनुष्य इस पृथ्वी नामक ग्रह पर अपने आविर्भाव से लेकर आज तक प्रकृति पर आश्रित रहा है। प्रकृति पर आश्रित रहना उसकी विवशता है। प्रकृति ने पृथ्वी के वातावरण को इस प्रकार बनाया है कि वह जीव-जन्तुओं के जीवन के लिए उपयुक्त सिद्ध हुआ है। पृथ्वी का वातावरण कहलाता है।

पर्यावरण संरक्षण

मनुष्य ने सभ्य बनने और दिखने के प्रयास में पर्यावरण को दूषित कर दिया है। पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखना मानव तथा जीव-जन्तुओं के हित में है। आज विकास के नाम पर होने वाले कार्य पर्यावरण के लिए संकट बन गए है। पर्यावरण के संरक्षण की आज महती आवश्यकता है।

पर्यावरण प्रदूषण

आज का मनुष्य प्रकृति के साधनों का अविवेकपूर्ण और निर्मम दोहन करने में लगा है। सुख-सुविधाओं की प्राप्ति के लिए नाना प्रकार के उद्योग खड़े किए जा रहे हैं, जिनका कूड़ा-कचरा और विषैला अपशिष्ट भूमि, जल और वायु को प्रदूषित कर रहा है। हमारी वैज्ञानिक प्रगति ही पर्यावरण को प्रदूषित करने में सहायक हो रही है।

पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार

आज हमारा पर्यावरण तेजी से प्रदूषित हो रहा है। यह प्रदूषण मुख्य रूप से तीन प्रकार का है –

  1. जल प्रदूषण
  2. वायु प्रदूषण
  3. ध्वनि प्रदूषण
  4. मृदा प्रदूषण
  5. विकिरणजनित प्रदूषण
  6. खाद्य प्रदूषण
जल प्रदूषण :

जल मानव-जीवन के लिए परम आवश्यक पदार्थ है। जल के परम्परागत स्रोत हैं – कुएँ, तालाब, नदी तथा वर्षा का जल। प्रदूषण ने इन सभी स्रोतों को दूषित कर दिया है। महानगरों के समीप से बहने वाली नदियों की दशा दयनीय हैं। गंगा, यमुना, गोमती आदि सभी नदियों की पवित्रता प्रदूषण की भेंट चढ़ गई है। उनको स्वच्छ करने में करोड़ों रुपये खर्च करके भी सफलता नहीं मिली है, अब तो भूमिगत जल भी प्रदूषित हो चुका है।

वायु प्रदूषण :

वायु भी जल की तरह अति आवश्यक पदार्थ है। आज शुद्ध वायु का मिलना भी कठिन हो गया है। वाहनों, कारखानों और सड़ते हुए औद्योगिक कचरे ने वायु में भी जहर भर दिया है। घातक गैसों के रिसाव भी यदा-कदा प्रलय मचाते रहते है। गैसीय प्रदूषण ने सूर्य की घातक किरणों से धरती की रक्षा करने वाली ‘ओजोन परत’ को भी छेद डाला है।

ध्वनि प्रदषण :

कर्णकटु और कर्कश ध्वनियाँ मनुष्य के मानसिक सन्तुलन को बिगाड़ती है और उसकी कार्य-क्षमता को भी प्रभावित करती है। आकाश में वायुयानों की कानफोड़ ध्वनियाँ, धरती पर वाहनों, यन्त्रों और संगीत का मुफ्त दान करने वाले ध्वनि-विस्तारकों का शोर – सब मिलकर मनुष्य को बहरा बना देने पर तुले हुए है।

इनके अतिरिक्त अन्य प्रकार का प्रदूषण भी पनप रहा है। और मानव जीवन को संकट में डाल रहा है।

मृदा प्रदूषण :

कृषि में रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों के प्रयोग ने मिट्टी को भी प्रदूषित कर दिया है।

विकिरणजनित प्रदूषण :

परमाणु विस्फोटों तथा परमाणु संयन्त्रों से होते रहने वाले रिसाव आदि से विकिरणजनित प्रदूषण भी मनुष्य को भोगना पड़ रहा है।

खाद्य प्रदूषण :

मिट्टी, जल और वायु के बीच पनपने वाली वनस्पति तथा उसका सेवन करने वाले पशु-पक्षी भी आज दूषित हो रहे है। चाहे शाकाहारी हो या मांसाहारी, कोई भी भोजन प्रदूषण से नहीं बच सका है।

प्रदूषण नियंत्रण (रोकने) के उपाय

प्रदूषण ऐसा रोग नहीं है जिसका कोई उपचार ही न हो। प्रदूषण फैलाने वाले सभी उद्योगों को बस्तियों से सुरक्षित दूरी पर ही स्थापित किया जाना चाहिए। किसी भी प्रकार की गन्दगी और प्रदूषित पदार्थ को नदियों और जलाशयों में छोड़ने पर कठोर दण्ड की व्यवस्था होनी चाहिए। वायु को प्रदूषित करने वाले वाहनों पर भी नियंन्त्रण आवश्यक है। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक जीवन जीने का अभ्यास करना भी आवश्यक है। प्रकृति के पतिकूल चलकर हम ⇒पर्यावरण प्रदूषण पर विजय नहीं पा सकते। जनसंख्या की अनियंत्रित वृद्धि को रोकने की भी जरूरत है। छायादार तथा सघन वृक्षों को आरोपण भी आवश्यक है। कृषि में रासायनिक खाद तथ कीटनाशक रसायनों के छिड़काव से बचना भी जरूरी है।

उपसंहार

पर्यावरण प्रदूषण एक अदृश्य दानव की भाँति मनुष्य-समाज या समस्त प्राणी-जगत् को निगल रहा है। यह एक विश्वव्यापी संकट है। यदि इस पर समय रहते नियन्त्रण नहीं किया गया तो आदमी शुद्ध जल, वायु, भोजन और शान्त वातावरण के लिए तरस जाएगा। प्रशासन और जनता, दोनों के गम्भीर प्रयासों से ही प्रदूषण से मुक्ति मिल सकती है।

प्रदूषण पर निबंध

निबंध : 3

प्रदूषण – वृद्धि की समस्या
अथवा
पर्यावरण बचाओ अभियान

रूपरेखा

  1. प्रस्तावना
  2. पर्यावरण-प्रदूषण के प्रकार
  3. पर्यावरण प्रदूषण : जिम्मेदार कौन
  4. प्रदूषण रोकने के उपाय
  5. उपसंहार

प्रस्तावना

‘‘आज की दुनिया विचित्र नवीन,
प्रकृति पर सर्वत्र है विजयी पुरुष आसीन,
हैं बँधे नर के करों में वारि, विद्युत, भाप,
हुक्म पर चढ़ता-उतरता है पवन का ताप।’’

वैज्ञानिक प्रगति के उन्माद से ग्रस्त मानव के प्रकृति-माता को दासी के पद पर धकेल दिया है। वह नान प्रकार से प्रकृति के निर्मम दोहन में व्यस्त है। उसे विरूप बना रहा है। उद्योगों का कूड़ा-कचरा और विषैले विसर्जन पर्यावरण को प्रदूषित करने की होड़ में लगे हुए है। मनुष्य ने अपने ही प्रमाद से अपने भविष्य को अंधकारमय बना डाला है।

पर्यावरण-प्रदूषण के प्रकार

  1. जल प्रदूषण
  2. वायु प्रदूषण
  3. खाद्य प्रदूषण
  4. ध्वनि प्रदूषण
  5. विकिरणजनित प्रदूषण
जल प्रदूषण :

जल मानव जीवन के लिए परम आवश्यक पदार्थ है। जल के परम्परागत स्रोत्र हैं-कूएँ, तालाब, नदी तथा वर्षा का जल। प्रदूषण ने इस सभी स्रोतों को दूषित कर दिया है। औद्योगिक प्रगति के साथ-साथ हानिकारक कचरा और रसायन बड़ी बेदर्दी से इन जलस्रोतों में मिल रहे है। महानगरों के समीप से बहने वाली नदियों की दशा तो अत्यन्त दयनीय हो गई है। गंगा, यमुना, गोमती आदि सभी नदियों की पवित्रता प्रदूषण की शिकार हो गई है। यह प्रदूषित अगर मानव के द्वारा उपयोग में लाया जाता है। तो भी यह कई रोग उत्पन्न कर सकता है। अतएवं हमें जल प्रदूषण की रोकथाम हेतु उचित उपाय करने चाहिए।

वायु प्रदूषण :

वायु भी जल जितना ही आवश्यक पदार्थ है। श्वास-प्रश्वास के साथ वायु निरन्तर शरीर में आती जाती है। आज शुद्ध वायु का मिलना भी कठिन हो गया है। वाहनों, कारखानों और सड़ते हुए औद्योगिक कचरे ने वायु में भी जहर भर दिया है। घातक गैसों के रिसाव भी यदा-कदा प्रलय मचाते रहते हैं। गैसीय प्रदूषण ने सूर्य की घातक किरणों से रक्षा करने वाली ‘ओजोन परत’ को भी छेद डाला है। जिससे सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरण सीधे पृथ्वी तक पहुँचती है। और कई प्रकार के रोग उत्पन्न कर देती है। इसलिए हमें इसके प्रति सजक होना चाहिए।

खाद्य प्रदूषण :

प्रदूषित जल और वायु के बीच पनपने वाली वनस्पति या उसका सेवन करने वाले पशु-पक्षी भी आज दूषित हो रहे है। चाहे शाकाहारी हो या माँसाहारी कोई भी भोजन के प्रदूषण से नहीं बच सका। इसी के साथ मानव भी इस खाद्य प्रदूषण का शिकार हो रहा है। अतः सजकता सभी क्षेत्रों में अनिर्वाय हो चुकी है।

ध्वनि प्रदूषण :

ध्वनि प्रदूषण की बात की जाए। तो ध्वनि को प्रदूषित करने वाले कारक हमारे चारों ओर बहुतायत में आपको नजर आ जाएगें। ध्वनि प्रदूषण से तात्पर्य उच्चतम ध्वनि है जिसे आम मानव सहन नहीं कर सकता है। हवाईजहाज की कान फोडु ध्वनि आदि इसी में सम्मिलित है। इस प्रकार ध्वनि प्रदूषण मनुष्य को गूँगा, बहरा और अचेत बना देता है।

विकिरणजनित प्रदूषण :

वैज्ञानिकों के द्वारा किए गए परमाणु विस्फोस्ट परिक्षण, संयंत्रों से होते रहने वाले रिसाव आदि विकिरणजनित प्रदूषण के अन्तर्गत आते है। जो आज मनुष्य भोग रहा है। इसमें सभी प्रकार के रेडियोंधर्मी पदार्थ सम्मिलित है जो विकिरणें उत्पन्न कर इस प्रदूषण को बढ़ावा देते है। उदाहरण: यूरेनियम।

पर्यावरण प्रदूषण : जिम्मेदार कौन ?

प्रायः हर प्रकार के प्रदूषण की वृद्धि के लिए हमारी औद्योगिक और वैज्ञानिक प्रगति तथा मनुष्य का अविवेकपूर्ण आचरण ही जिम्मेदार है। वाहनों का गैस-विसर्जन, चिमनियों का धुआँ, रसायनशालाओं की विषैली गैसें मनुष्यों की साँसों में जहर फूंक रही है। सभी प्रकार के प्रदूषण हमारी औद्योगिक और जीवन-स्तर की प्रगति से जुड़ गये है। हमारी हालत साँप-छछूँदर जैसी हो रही है।

प्रदूषण रोकने के उपाय

⇒प्रदूषण ऐसा रोग नहीं है कि जिसका कोई उपचार ही न हो। प्रदूषण फैलाने वाले सभी उद्योगों को बस्तियों से सुरक्षित दूरी पर ही स्थापित किया जाना चाहिए। किसी भी प्रकार की गन्दगी और प्रदूषित पदार्थ को नदियों और जलाशयों में छोड़ने पर कठोर दण्ड की व्यवस्था होनी चाहिए। वायु को प्रदूषित करने वाले वाहनों पर भी नियंत्रण आवश्यक है।

  • प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने जो दीर्घगामी नीति बनाई है, भारत उसे स्वीकार कर चुका है। बहुसंख्यक देश भी इसे स्वीकार करने को तत्पर दिखते हैं। किन्तु अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति महोदय (ट्रंप) की भूमिका अत्यंत निराशाजनक है।

उपसंहार

पर्यावरण का प्रदूषण एक अदृश्य दानव की भाँति मुनष्य-समाज को निगल रहा है। यह एक विश्वव्यापी संकट है। यदि इस पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया जाता है तो आदमी शुद्ध जल, वायु, भोजन और शान्त वातावरण के लिए तरस जायेगा। प्रशासन और जनता, दोनों के गम्भीर प्रयासों से ही प्रदूषण से मुक्ति मिल सकती है।

तो दोस्तो आज के आर्टिकल में हमने प्रदूषण (Pollution in Hindi) को विस्तार से समझा। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया। तो इसे अपने दोस्तो के साथ शेयर जरूर करें। और इसी प्रकार की बेहतरीन जानकारी के लिए हमारे साथ बने रहें।

धन्यवाद !

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